कपकोट का उप जिला चिकित्सालय बनने की खबर सुनकर जनता ने सोचा था अब स्वास्थ्य सुविधाओं की तस्वीर बदलेगी,
लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि अस्पताल खुद इलाज मांग रहा है।
एक तरफ मेडिकल वेस्ट का पहाड़,
दूसरी तरफ स्वच्छक के रिटायरमेंट के बाद गंदगी का अंबार।
मरीजों की लंबी कतारें हैं, मगर सात स्पेशलिस्ट डॉक्टरों में से एकमात्र डॉक्टर भी जिला चिकित्सालय बागेश्वर अटैच कर दिया गया।
प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से डॉक्टरों को खींचकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में बैठा दिया गया और गांवों की स्वास्थ्य व्यवस्था भगवान भरोसे छोड़ दी गई।
विडंबना देखिए…
जहां सोलर वाटर हीटर होना चाहिए था वहां उसके ऊपर टिन की छत डाल दी गई।
एम्बुलेंस खुद बीमार हो चुकी हैं, ढाई लाख किलोमीटर से ज्यादा चल चुकी गाड़ियां रास्ते में कहीं भी दम तोड़ देती हैं।
फरसाली के मासूम बच्चे को जंगली सूअर के हमले में घायल होने पर यहां सिर्फ टांके लगे और फिर तीन महीने जिला अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़नी पड़ी।
जो प्रभारी मरीज की जान बचाने के लिए अपने विवेक से ₹1000 का तेल भराकर मरीज को जिला अस्पताल भेजता है, उसका चार्ज हटा दिया जाता है।
और दूसरी तरफ अपने चहेतों को कुर्सियों पर बैठाने का खेल जारी है।
“ये कैसी हुकूमत का हाल हो गया,
अस्पताल भी अब बेहाल हो गया।
इलाज मांग रही हैं खुद व्यवस्थाएं यहां,
जनता का भरोसा भी कंगाल हो गया।”
कपकोट की जनता पूछ रही है —
क्या यही है भाजपा सरकार की स्वास्थ्य क्रांति?
जहां अस्पतालों में इलाज से ज्यादा अव्यवस्था दिखाई दे रही है।
