जाति के आधार पर आरक्षण खत्म हो
जाति के आधार पर आरक्षण को अब महज वोट पाने और समाज को तोड़ने व बांटने के लिए औजार के रूप में चलाया जा रहा है जिसमें किसी का भला होने वाला नहीं है। देश में अब विभिन्न जातियों को हिन्दु-मुसलमान को या सिख-जैन को ताकतवर बनाने की जरूवत नहीं हैं जरूवत गरीबी खत्म करने की है।
देश में आरक्षण की मांग करने वाले कई जातियों ने गलत तरीका अपनाकर देश को करोड़ो की क्षति पहुंचाई है।अब इसका असर सामने आने ही वाला है कि शिक्षा व नौकरी में आरक्षण चाहने वाले व्यक्ति की आर्थिक स्थिति के आधार पर करने की मांग बड़े पैमाने पर उठेगी। हम सभी को ठीक से पता रहना चाहिए कि दलित जातियों के राजनीतिक और आर्थिक उठान के सबसे बड़े और सबसे ज्यादा प्रामाणिक भारतरत्न बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर दलितों के लिए आरक्षण के पक्ष में कभी थे ही नहीं । संविधान में इस तरह के आरक्षण के लिए जब दबाब डाला गया तो वे इसी शर्त पर इसके लिए सहमत हुए थे कि करीब 15 वर्ष की निशिचित समय अवधि के बाद इस व्यवस्था को समाप्त कर दिया जायेगा पर हम सभी ने देखा है कि हमेशा के लिए दलितों का राजनीतिक समर्थन करते रहने के लिए देश के राजनीतिक दलों ने इस व्यवस्था की समयावधि को धीरे धीरे बढ़ाकर उसे अंनंत समय तक के लिए बढ़ा दिया है।जाहिर है कि दलितों के लिए कालातीत बना दी गई है। इस आरक्षण व्यवस्था में दलितों को शेष हिन्दु समाज से अलग बनाए रखने की चालाक सोच ही अब काम कर रही है जिसे देश स्वीकार नहीं कर पाएगा ,क्योंकि आरक्षण के पीछे की मूल अवधारणा यह थी ही नहीं । दलितों को शिक्षा संस्थाओं और नौकरीयों में आरक्षण देकर समाज को मुख्यधारा का हिस्सा बनाने की डां. अम्बेडकर की राष्ट्रवादी सोच को बड़ा धक्का तब लगा जब केंद्र की राजनीति सत्ता हासिल करने के निहित स्वार्थ की वजह से घोर जातिवाद के शिकार विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कथित पिछड़ी जातियों को मण्डल आयोग की सिफारिशों का बहाना बनाकर आरक्षण प्रदान कर दिया तब भी देश को बताने की कोशिश की थी कि कथित पिछड़ी जातियां कभी पिछड़ी थी ही नहीं , विभिन्न जातियों को आरक्षण के पीछे धकेल दिए जाने खुद को सत्ता की कुर्सी पर बिठाने का नारा बन चुका हैं ंमुस्लिम वोट पाने की लालसा के मारे काग्रेस ने भी पिछड़े मुसलमानों को आरक्षण के नाम पर कुछ दिया जाय अभी हाल ही में गुर्जर जाति के समुदायों ने केंद्र की सरकार को हिला के रख दिया था और केंद्र सरकार को झुकना पड़ा इसी तरह से जाट समुदाय के लोगों ने देश की रेल वयवस्था को चूर चूर कर दिया था अब और कोई जाति के लोग इसी तरह के आरक्षण की मांग करते रहगें।वहीं और वैसा आरक्षण हिंन्दुओं ,सिखों ,जैनों ,बौद्धों वगैरह को क्यों नहीं दिया जाना चाहिए क्योंकि गरीब तो वहां भी कम नहीं हैं मानों इसी से प्रेरण लेकर बसपा नेता मायावती ने सवर्ण हिंन्दुअेंा को भी आर्थिक आधार पर आरक्षण की पुरजोर वकालत कर डाली थी । जिसका कहीं पर से विरोध नहीं हुआ ।अब यह आरक्षण देश के लिए नासूर बन गया है । भारत जैसे विकासशील देश में आरक्षण जैसी एक सकारात्मक व्यवस्था का होना जरूरी हैं। पर उसे जाति के आधार पर नहीं ,बल्कि आर्थिक आधार पर आज नहीं तो कल होना ही है। जाति के आधार पर आरक्षण को अब महज वोट पाने और समाज को तोड़ने व बांटने के औजार के रूप में चलाया जा रहा हैं जिसमें किसी का भी भला होने वाला नहीं है। अब किसी भी जाति को ताकतवर बनाने की जरूवत नहीं हैं जरूवत गरीबी खत्म करने की हैं ं राजनैतिक पार्टीयां जल्द तैयार हो जाएं क्योंकि जल्दी देश के लोग मांग करगें कि अब जाति नहीं आर्थिक आधार पर हर जाति और हर समुदाय के लोगों को शिक्षा व नौकरीयां में आरक्षण दिया जाएं ,फिर बेशक वैसी आरक्षण व्यवस्था को संविधान की एक स्थाई पैरा बना दिया जाएं तब गुर्जरों ,जाटों को किसी को भी आरक्षण के लिए आन्दोलन नहीं करना पड़ेगा और आर्थिक आधार पर हरेक को खुद-व-खुद आरक्षण जैसी सकारात्मक लाभ मिलता रहेगा ।राजेन्द्र सिंह गढ़िया ,सम्पादक
